मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र खारिज कर दिया गया है. इस फैसले के बाद बीजेपी के महेश केवट का राज्यसभा जाने का रास्ता साफ हो गया है. लेकिन क्या मीनाक्षी नटराजन के लिए अभी भी खुल सकते हैं राज्यसभा के दरवाजे? आइए समझते हैं.
मध्य प्रदेश की सियासत में राज्यसभा चुनाव 2026 को लेकर एक बहुत बड़ा और अप्रत्याशित उलटफेर देखने को मिला है, जिसने राज्य के राजनैतिक गलियारों में पूरी तरह हड़कंप मचा दिया है. जिस राज्यसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार की जीत तय थी, हॉर्स ट्रेडिंग से बचने के लिए विधायकों को कर्नाटक ले जाया जा रहा था, अब उसी सीट से कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का पर्चा ही खारिज हो गया. रिटर्निंग ऑफिसर अरविंद शर्मा द्वारा लिए गए इस बड़े फैसले के बाद जहां कांग्रेस ने इसे पूरी तरह से लोकतंत्र की हत्या और पक्षपातपूर्ण कार्रवाई करार दिया है, तो भारतीय जनता पार्टी इसे नियमों के तहत पूरी तरह से न्यायसंगत और सही कदम बता रही है. विदित हो कि मध्य प्रदेश से राज्यसभा की कुल तीन सीटों पर चुनाव होना तय हुआ था, जिसमें संख्या बल के आधार पर दो सीटें पहले से ही भाजपा के खाते में जाना तय माना जा रहा था. वहीं, तीसरी सीट पर कांटे की टक्कर की उम्मीद थी, जहां भाजपा ने मछुआ कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष महेश केवट को उतारा था और मुकाबला महेश व मीनाक्षी के बीच था. लेकिन अब नामांकन रद्द होने के बाद महेश केवट का निर्विरोध राज्यसभा में जाने का रास्ता लगभग साफ होता नजर आ रहा है.
इस पूरे विवाद की मुख्य वजह मीनाक्षी नटराजन के शपथ पत्र में दी गई जानकारियों से जुड़ी हुई है. बीजेपी उम्मीदवार महेश केवट और प्रदेश महासचिव राहुल कोठारी द्वारा रिटर्निंग ऑफिसर के समक्ष एक लिखित आपत्ति दर्ज कराई गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि मीनाक्षी नटराजन ने तेलंगाना के हैदराबाद की एक अदालत में लंबित एक सिविल मामले की जानकारी अपने हलफानामे यानी फॉर्म 26 में पूरी तरह से छुपा ली है. रिटर्निंग ऑफिसर के आदेश के अनुसार मीनाक्षी नटराजन को अक्टूबर 2025 में इस मामले से जुड़ा एक स्पष्टीकरण नोटिस मिला था, इसलिए उन्हें इसकी जानकारी थी और इसे न लिखना महत्वपूर्ण तथ्यों को छुपाने की श्रेणी में आता है. इसके विपरीत कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा का साफ तर्क है कि यह कोई आपराधिक मामला या पुलिस एफआईआर नहीं थी, बल्कि केवल एक मुआवजे की कार्यवाही से जुड़ा हुआ साधारण कारण बताओ नोटिस था. इसलिए इसे हलफनामे में दर्ज करना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं था. तो क्या मीनाक्षी नटराजन के लिए राज्यसभा के दरवाजे फिर से खुल सकते हैं?
इन नियमों के तहत मीनाक्षी के हक में आ सकता है फैसला?
दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट में विधानसभा के पूर्व प्रमुख सचिव भगवानदेव इसराणी ने चुनाव आयोग के नियमों के हवाले से कई बेहद चौंकाने वाले तथ्य सामने रखे हैं. उनके अनुसार रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा नामांकन रद्द करने का यह फैसला पूरी तरह नियमों के अनुकूल नहीं माना जा सकता है. उन्होंने चुनाव आयोग की आधिकारिक हैंडबुक के आधार पर तीन बड़े कानूनी पेंच बताए हैं, जो इस फैसले को कमजोर साबित करते हैं. इसराणी के अनुसार हैंडबुक के पॉइंट 10(xiii) के तहत यदि नामांकन में कोई त्रुटि मिलती है, तो उसे खारिज करने से पहले उम्मीदवार को अपनी गलती सुधारने के लिए कम से कम 24 घंटे का समय दिया जाना अनिवार्य है, जो मीनाक्षी को नहीं मिला. इसके अलावा हैंडबुक का पॉइंट 10(xii) स्पष्ट कहता है कि केवल अधूरी या विरोधाभासी जानकारी के आधार पर सीधे पर्चा रद्द नहीं किया जा सकता. लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत कोई भी उम्मीदवार तब तक अयोग्य नहीं होता जब तक कि किसी अदालत द्वारा उसे दोषी ठहराकर कम से कम दो साल की सजा न सुना दी गई हो.
कांग्रेस के पास हैं ये 3 बड़े विकल्प
अब कांग्रेस पार्टी के पास मुख्य रूप से तीन बड़े कानूनी विकल्प मौजूद हैं, जिन पर वे अपने वकीलों के साथ विचार कर रही है. पहले विकल्प के रूप में कांग्रेस चुनाव आयोग दिल्ली के समक्ष इस फैसले की समीक्षा की मांग कर सकती है और यह दलील दे सकती है कि यह सिर्फ एक निजी शिकायत थी न कि कोई एफआईआर. दूसरे और सबसे प्रभावी विकल्प के तौर पर कांग्रेस जबलपुर या इंदौर हाईकोर्ट की वेकेशन बेंच के सामने रिट याचिका दायर कर रिटर्निंग ऑफिसर के इस आदेश को सीधे चुनौती दे सकती है, जिसे कानूनी जानकार सबसे तेज और सबसे कारगर तरीका मान रहे हैं. तीसरे विकल्प के तहत चुनाव की पूरी प्रक्रिया समाप्त होने और नतीजे आने के बाद कांग्रेस इलेक्शन पिटीशन के माध्यम से परिणाम को चुनौती दे सकती है, हालांकि इस प्रक्रिया में काफी लंबा समय लगने की संभावना रहती है. ऐसे में कह सकते हैं कि मीनाक्षी के लिए राज्यसभा के दरवाजे अभी पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं, लेकिन अब सब कुछ पूरी तरह से हाईकोर्ट के आने वाले रुख पर ही निर्भर करेगा.
