छतरपुर | कहते हैं कि दुनिया में इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं होता, और जब कोई बेबस इंसान संकट में फंसा हो, तो ईश्वर किसी न किसी रूप में फरिश्ते को मदद के लिए भेज ही देता है। मऊगंज से आई एक लाचार और रोती-बिलखती मां के लिए छतरपुर के एडवोकेट व समाजसेवी संजय शर्मा एक ऐसे ही फरिश्ते साबित हुए। शर्मा के अथक प्रयासों, त्वरित सूझबूझ और मानवीय संवेदनाओं के चलते एक महीने से लापता मानसिक विक्षिप्त बेटा आखिरकार अपनी मां की आगोश में पहुंच गया।
हाथ में फोटो, आंखों में आंसू लिए बस स्टैंड पर भटक रही थी मां मिली जानकारी के अनुसार मऊगंज की रहने वाली कलावती द्विवेदी का 30 वर्षीय इकलौता बेटा संदीप मानसिक रूप से विक्षिप्त है। करीब एक महीने पहले छतरपुर यात्रा के दौरान संदीप अचानक कहीं लापता हो गया था। अपने कलेजे के टुकड़े को ढूंढ़ते हुए यह लाचार मां छतरपुर बस स्टैंड पर हर आने जाने वाले, ऑटो चालकों और दुकानदारों को बेटे की तस्वीर दिखाकर रोते हुए पूछ रही थी भैया, हमारे लड़के को कहीं देखा क्या, वह कई दिनों से बिछड़ गया है।
शुरू हुई डिजिटल मुहिम जब यह वृद्ध मां बस स्टैंड पर आंसू बहा रही थी, तभी मानसिक रोगियों के सेवक एड. संजय शर्मा की नजर उन पर पड़ी। तड़पती हुई मां का दर्द देखकर शर्मा का दिल पसीज गया। उन्होंने तुरंत आगे बढ़कर मां के आंसू पोंछे, उसे ढांढस बंधाया और ठान लिया कि इस बेटे को उसकी मां से मिलाकर ही दम लेंगे। शर्मा ने बिना वक्त गंवाए बस स्टैंड के स्थानीय व्यवसायी विवेक उप्पल को साथ लिया और युवक की फोटो व उससे जुड़ी जानकारी को सोशल मीडिया तथा स्थानीय मीडिया ग्रुप्स में तेजी से वायरल करवा दिया।
महोबा रोड पर मिला सुराग, भावुक कर देने वाला था वो मंजर संजय शर्मा की यह मुहिम चंद घंटों में ही रंग ले आई। सोशल मीडिया पर वायरल हुई पोस्ट को देखकर एक जागरूक नागरिक ने सूचना दी कि हूबहू इसी शक्ल का एक युवक पिछले 20-25 दिनों से महोबा रोड पर केंद्रीय विद्यालय के पास स्थित एक मंदिर में रह रहा है। सुराग मिलते ही संजय शर्मा ने खुद मोर्चा संभाला और वृद्ध महिला को अपनी देखरेख में लेकर तुरंत उस मंदिर पहुंचे। मंदिर प्रांगण में जैसे ही मां कलावती और बेटे संदीप का सामना हुआ, दोनों एक-दूसरे के गले लगकर फूट-फूट कर रो पड़े। एक महीने की तड़प, बेचैनी और भटकन का एक बेहद सुखद अंत हो चुका था।
वहां मौजूद हर शख्स की आंखें इस भावुक और ऐतिहासिक मिलन को देखकर नम हो गईं। संजय शर्मा के इस निःस्वार्थ और परोपकारी कार्य ने एक बार फिर साबित कर दिया कि समाज में आज भी इंसानियत और संवेदनाएं जिंदा हैं। खुशी के आंसुओं के साथ अपने घर के लिए रवाना हुआ परिवार अपने इकलौते बेटे को सुरक्षित और सही सलामत वापस पाकर मां कलावती के आंसू थम नहीं रहे थे, लेकिन इस बार ये आंसू बेबसी के नहीं, बल्कि असीम खुशी के थे। उन्होंने भावुक होकर संजय शर्मा के सामने हाथ जोड़कर उन्हें कोटि-कोटि धन्यवाद दिया और उनके लिए दुआएं मांगी। इसके बाद शर्मा ने पूरे सम्मान के साथ बुजुर्ग महिला और उनके परिजनों को बेटे संदीप के साथ सकुशल रवाना किया।
